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Update on February 15, 2013

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न कोई सरकारी इमदाद और न
ही खुद को प्रख्यात करने का मकसद भूखे का पेट भरने को सेवा मानकर तारा पीठ हुलकी
माता के पुजारी किशोर जी दो दशक से भी अधिक समय से मंदिर के भीतर गरीब और
निराश्रितों को सुबह शाम भोजन खिलाने के सिलसिले को टूटने नहीं दे रहे। मंदिर
परिसर में सुबह शाम दोनों वक्त का भंडारा कराने की शुरूआत वर्ष 1989 में हुई थी।
महंगाई के बावजूद यह भंडारा कभी एक दिन के लिए भी बंद नहीं हुआ। यह आयोजन सौहार्द
और इंसानियत की मिसाल है। चाहे किसी भी धर्म और मजहब से जुड़ा कोई व्यक्ति क्यों न
हो मंदिर परिसर के दरवाजे उसकी भूख मिटाने के लिए खुले रहते हैं।

हुल्की
माता तारा पीठ के पुजारी किशोर जी के मुताबिक 1 जून 1989 को मंदिर परिसर
में सुबह शाम गरीबों को भोजन कराने की व्यवस्था यहां शुरू हुई थी। शुरूआत डा.जेडी
अवस्थी ने की। तब एक बोरा अनाज पंद्रह दिन चलता था। बाद में उन्होंने इस सिलसिले
को हमेशा जारी रखने का बीड़ा उठाया। शुरूआत में गरीबों को कंबल वितरित किए गए लेकिन
इसमें तमाम जरूरतमंद रह जाते थे। पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने वाले
असहाय और निराश्रित को मंदिर में ही भोजन मिलने से ऐसी हिकारत से मुक्ति मिल रही
थी जिससे उनके मन को भी सुकून मिलता था। भूखे का पेट भरने के इस पुण्य काम से बिना
किसी स्वार्थ के सैकड़ों किसान जुड़ गए। साल में तीन बार वे पूरे जिले में भ्रमण कर
दान करने वाले किसानों से खाद्यान्न लेकर भंडारण कर लेते हैं। पर्याप्त भंडारण की
वजह से एक दिन भी रसोई में कमी नहीं आयी। रोज सौ गरीबों के भोजन व्यवस्था का औसत
है। पक्के भोजन में एक दिन का खर्चा 61 सौ रुपये आता है और
कच्चे भोजन पर 41 सौै रुपये। मानवीय गरिमा और सम्मान को ध्यान में रखकर पत्तल की बजाए
स्टील के बर्तन में गरीबों को भोजन दिया जाता है। अब इस व्यवस्था से निस्वार्थ भाव
से इतने लोग जुड़ गए हैं कि ये सिलसिला कभी नहीं टूटेगा। मकसद एक है कि किसी भी
व्यक्ति की भूख से मौत न हो। उसे सम्मान से भोजन मिले। इससे प्रेरणा लेकर अब तमाम
लोग अपने बच्चों के जन्म दिवस, खुशी के अन्य पलों को गरीबों केसाथ बांटते हुए एक एक दिन
मंदिर में भोजन का खर्च उठाने की जिम्मेदारी लेते गए। इससे भंडारा और बृहद होता
गया। किशोर जी के मुताबिक मजहबी बातों से अलग मुस्लिम समाज के लोगों ने भी कई बार
यहां भोजन कराया है।

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