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सरकार को नारी के साथ बलात्कार उसके खिलाफ़ सबसे जघन्य हिंसा मानने में अब देर नहीं करनी चाहिये.नारी की गरिमा की रक्षा के लिये बलात्कार को किसी भी सूरत में हत्या से कमतर आंकना सिरे से खारिज करने योग्य है. घरों में काम करने वाली नौकरानियां, दफ़्तरों का अधीनस्त अमला, इतना ही नहीं उंचे पदों पर काम कर रहीं महिलाएं तक भयभीत हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के सिर्फ 2011 के आंकड़ों पर ही नजर डाल लें तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है कि आखिर महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार, शारीरिक उत्पीड़न और छेड़छाड़ के साथ ही महिलाओं के अपहरण और घर में पति या रिश्तेदारों के उत्पीड़न के मामलों की लिस्ट काफी लंबी है। साल 2011 में हर रोज 66 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुई। एनसीआरबी के अऩुसार 2011 में बलात्कार के 24 हजार 206 मामले दर्ज हुए जिनमें से सजा सिर्फ 26.4 फीसदी लोगों को ही हुई जबकि महिलाओं के साथ बलात्कार के अलावा उनके शारीरिक उत्पीड़न, छेड़छाड़ के साथ ही उनके उत्पीड़न के 2 लाख 28 हजार 650 मामले दर्ज किए गए जिसमें से सजा सिर्फ 26.9 फीसदी लोगों को ही हुई। ये वो आंकड़ें हैं जिनमें की हिम्मत करके पीड़ित ने दोषियों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई…इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि असल में ऐसी कितनी घटनाएं घटित हुई होंगी क्योंकि आधे से ज्यादा मामलों में पीड़ित समाज में लोक लाज या फिर दबंगों के डर से पुलिस में शिकायत ही नहीं करती या उन्हें पुलिस स्टेशन तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है। सबसे बड़ी बात ये है कि आंकड़ें इस पर से पर्दा हटाते हैं कि इन मामलों में कार्रवाई का प्रतिशत सिर्फ 25 है…यानि कि 75 फीसदी मामले में या तो आरोपी बच निकले या फिर ये मामले सालों तक कोर्ट में लंबित पड़े रहते हैं और आरोपी जमानत पर खुली हवा में सांस ले रहा होता है।" अगर 71.1 प्रतिशत दरिंदे खुले आम घूम रहें हों तो कौन भयभीत न होगा.
यौनिक अपराधों की सुनवाई केवल 30 दिन से अधिक का वक़्त नहीं मिलना चाहिये. सजा मौत से कम न हो वरना रेशमा जैसी नारी जीवन भर एक आक्रांत जीवन जियेगी शायद मुस्कुराहट लौट न पाए कभी . बेटियों के खिलाफ़ होते समाज को वापस नेक चलनी की राह दिखाने के लिये अगर कठोर क़ानून न बने तो समाज का पतन दूर नहीं होगा.
मेरे व्यक्तिगत राय ये भी है कि एक ऐसा कानून बनाया जाये जो औरत के खिलाफ़ जिस्मानी ज़्यादती को हत्या के समान कारित माने. सच्चे पुरुष कभी भी किसी नारी के आत्म सम्मान की हत्या नहीं करते. बलात्कारी सदैव हत्यारा होता है. कसाब सरीखा आतंकी होता है... उससे बस जितना जल्द हो सके दुनिया से बिदाई "फ़ांसी के तख्त पर" दे देनी चाहिये.