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हमारे देश का सरकारी तंत्र असहिष्णुता और दमनात्मक कार्यवाहियों में नित नए रेकार्ड स्थापित कर रहा है। आज देश के नागरिकों का कोई भी तबका सरकार के इस अघोषित फासीवादी हमले से अछूता नही रहा है। मजदूरों, किसानों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, विद्यार्थियों के साथ-साथ जन-पक्षधर कलाकारों, रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों पर हमले तेजी से बढ़े हैं। इस क्रम में सबसे नया उदाहरण है हिंदी के वरिष्ठ कवि यश मालवीय के खिलाफ इलाहाबाद स्थित महालेखाकार विभाग के अधिकारियों का तानाशाहीपूर्ण रवैया जिसके चलते हमारे इस प्रिय कवि को जबरदस्त मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ रही हैं।   

जैसा कि हमे पता चला है, इस प्रकरण की शुरुआत पिछले साल फरवरी में हुई जब विभाग के कुछ कर्मचारियों द्वारा महालेखाकार प्रथम पी के तिवारी के खिलाफ विरोध व्यक्त किया गया। विभाग में सीनियर एकाउंटेंट के तौर पर काम करने वाले मालवीय का कसूर यह था कि उन्होने इस कर्मचारियों को संबोधित किया। इसके बाद विभाग ने कुछ कर्मचारियों की सेवायें स्थायी तौर पर समाप्त करते हुये यश मालवीय को भी अस्थायी तौर पर बर्खास्त कर दिया। तकरीबन एक साल बाद फरवरी 2013 में मालवीय की सेवा बहाल तो की गई लेकिन उनके वर्तमान पद से दो पायदान पदावनति के साथ! यही नही काम का बोझ अत्यधिक बढ़ा कर, लगातार घोर निगरानी करके और अन्य तरीकों से मालवीय को लगातार प्रताड़ित किया गया। इस यातनापूर्ण रवैये के चलते मालवीय की तबियत खराब हो गई लेकिन उनके खिलाफ विभाग का रवैया नही बदला और यहां तक की उन पर अविश्वास करते हुए विभाग ने उनका मेडिकल परीक्षण अपनी निगरानी में कराया। उनके बीमार पाए जाने पर विभाग के लोग उन पर नजर रखने के लिए उनके घर पर बने रहते हैं। (इस पूरे घटनाक्रम पर अधिक जानकारी के लिए इस पते पर जाएं- http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/77-art/3979-kavi-yash-malviya-ka-bhayankar-utpidan-by-abhinav-shrivastava)    

इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से निगाह डालने पर यह साफ हो जाता है कि यश मालवीय के ऊपर निशाना साधा जा रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं अगर सत्ता-प्रतिष्ठान को इस कवि के मुखर जन-पक्षधर स्वर से असुविधा हो रही हो! हमारे आस-पास, पूरे देश में यह हो रहा है। यह हम सबके लिए सचेत हो जाने का संकेत है। साथ ही यह चुनौती है कि हम अपनी संवेदनाओं, सरोकारों और साझेदारियों को पुख्ता कर दमन का मुकाबला करें। यश मालवीय के ऊपर साधा गया निशाना दरअसल जन-पक्षधर आवाजों के ऊपर साधा गया निशाना है।

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