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अमीर बनने का सपना मुझे हमेशा ही से किसी बुरी इच्छा जैसा लगता रहा है। ऐसा कई बार हुआ जब मेरे कुछ शुभ चिन्तकों ने मुझे पैसा कमाने तथा अमीर बनने की तरकीबें बताईं, विशेष रूप से उन दिनों जब मेरी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पिता की बेरोजगारी फिर उनकी असमय मृत्यु ने माँ सहित मेरे सात भाई बहनों की हालत खराब कर दी थी, उन दिनों भी अमीर बनने की तरकीब बताने वालों को मैं अच्छी नजर से नहीं देखता था। हाँ, परिश्रम से आय अर्जित करने या उसमें वृद्धि का तरीका बताने वालों को अवश्य मैं गंभीरता से सुनता था, ऐसे समय में जब प्रत्येक व्यक्ति जल्द से जल्द अमीर बन जाना चाहता है और यदि वह पहले से अमीर या अच्छी आय वाला है तो अपनी अमीरी को तीन-तिकड़म और नितांत अनैतिक तरीके से, देश की जड़ों में मठ्ठा डालने की हद तक जाकर वह चैगुनी-अठगुनी-सौगुनी भी अमीरी हासिल करने के लिए व्याकुल है। हर तरफ अमीरी की होड़ है, पूँजी का निर्लज्ज नृत्य है, ताण्डव है, घनलोलुप राक्षसों का भयानक चकाचैं।ध है, उससे भी भयानक शोर है। ऐसे में से थोड़ा परे मैं हूँ और मेरे जैसे बहुत से लोग विपरीत दिशा में खड़े हुए अमीरी के उथले-गहरे पन को निस्पृह भाव से देख रहे हैं। अमीरी उन्हें मुँह चिढ़ाती है परन्तु वे अवसाद से नहीं मृत्यु भाव से हँसते हैं, साहसी हैं वे लोग जो घनलोलुपता के महाहंगामे के प्रभावों को तो महसूस करते हैं परन्तु उसकी चपेट में नहीं आते। प्रशांत श्रीवास्तव की एक कविता की पंक्तियाँ हैं:-
चादरें
सिकुड़ने का हुनर जानती हैं,
वे हमारी महत्वाकांक्षाओं के अनुपात में
हो जाती हैं छोटी,
कुछ चादरें आजीवन छोटी ही रहती हैं
मगर तब उनकी उम्र बढ़ जाती है।

-शकील सिद्दीकी
मो0 09839123525

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