हिंदी को मातृभाषा से राष्ट्रभाषा बनाना है
- Posted to हिंदी को मातृभाषा से राष्ट्र भाष… by अविनाश एक हिन्
To: Indian Government
कब तक करेंगे विदेशी भाषा की गुलामी- विनोद बब्बर पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, ‘भारत अंग्रेज शासित देश है।’ ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया - भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस...
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यह दुनिया का
सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम
विदेशी भाषा अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। राजधानी
दिल्ली का अधिकतर शासकीय कार्य विदेशी भाषा में होता है। हर व्यक्ति के लिए
आवश्यक ड्राईविंग लाईसंेस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह
हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान
में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा
उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या
स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है? सत्य यह है कि हम
हीनता-ग्रन्थि के शिकार होकर अनेक भ्रम व पूर्वाग्रहण पाले हुए हैं। आज
अंग्रेजी माध्यम के स्कूल लोकप्रिय हो रहे हैं। हमारे बच्चों को हिन्दी में
गिनती भी नहीं आती। क्या यह हमारे लिए शर्मनाक बात नहीं है? दरअसल हम भ्रम
का शिकार है कि अंग्रेजी अकेली अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जो पूरी दुनिया
में समझी व बोली जाती है। सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में छह
भाषायें चलती हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, और अरबी। भारत की कुल
जनसंख्या में आधे से अधिक लोग हिन्दी बोलते समझते व लिखते हैं। अन्य विदेशी
भाषियों से हिन्दी कई गुना अधिक बड़ी है फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने
हिन्दी को स्वीकृति नहीं दी है तो इसका कारण हमारे प्रयासों का खोखलापन है,
हिन्दी का नहीं। कितने लोग मानते हैं कि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय डाक
भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच है। अंग्रेजी तो अपने देश इंग्लैंड में भी बड़ी
मुश्किल से राष्ट्रभाषा बन सकी है !
और हम अग्रेजी के गुलाम बने जा रहे है
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318Nitya Nand Sharma India1 mo ago
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